फैंसी ड्रेस में अपार्थीड

भारतीय अरेंज्ड मैरेज व्यवस्था के ख़िलाफ़

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Translated into the Hindi by Prabhat Bharat. 

भारतीय सिनेमा को प्रेम से बड़ा प्रेम है। वह अमीर और गरीब के बीच होने वाले प्रेम, धर्म-क्षेत्र-भाषा की सीमाओं के आर-पार होने वाले प्रेम को बड़े जश्न से मनाता है, यहाँ तक कि जेंडर और सेक्सुआलिटी के परंपरागत विचारों पर प्रश्न उठाने वाले प्रेम को भी। इस सिनेमा के किसी विदेशी दर्शक को तो ऐसा ही लगेगा जैसे भारत एक बड़ा ही प्रेममय समाज है। पर असल में सच्चाई इससे काफ़ी अलग है।

उदाहरण के लिए बॉलीवुड की एक लोकप्रिय शैली की फिल्मों को ज़रा देखें जो “पारिवारिक फ़िल्में” कहलाती हैं। ये ज़्यादातर तो अमीर मध्यमवर्गीय तबक़ों के लिए बनती हैं हाँलाकि इनके दर्शकों का वर्ग इससे काफ़ी ज्यादा बड़ा है—मैंने फिल्मों के लिए अपने कई दिन अपने पड़ोसियों के घर गुजारे हैं क्योंकि मेरे घर में केबल कनेक्शन नहीं था और ऊपर से ब्लैक-ऐंड-व्हाइट टीवी से ज्यादा मज़ा नहीं आता था। ये फ़िल्में, जो आसानी से तीन घंटे तक जा सकती हैं, अक्सर एक शादी के साथ ख़त्म होतीं हैं। पर उस तक पहुँचने के पहले एक दर्शक की मुलाक़ात हर किस्म के अलग-अलग किरदारों से होती है जो ज़्यादातर एक प्रेमी जोड़ी के दोनों तरफ़ के लंबे परिवारों से आते हैं। और फिर कहानी में एक के बाद एक कई मोड़ आते हैं—हर परिवार की कुछ व्यवसाय की समस्याएँ, जायदाद के ऊपर अनबन, एक चालबाज़ बड़ा भाई, हिंदू त्यौहारों का जश्न (अक्सर संगीत के साथ)—जो एक खिलते प्रेम को या तो आगे बढ़ाते हैं या उसके लिए एक ख़तरा बन के आते हैं। आख़िर में किसी भी तरह दूल्हा और दुल्हन हमेशा के लिए सुख के बंधन में बँध जाते हैं।

यह सब कुछ ऊपर ऊपर से ठीक-ठाक ही दिखता है। पर ज़रा क़रीब से देखें तो पता चलता है कि ये सारी पारिवारिक लम्बी-चौड़ी तोड़-मोड़ बस इस बात को छिपाने या कम से कम हल्का करने की कोशिश कर रही है कि यह फिल्म असल में अरेंज्ड मैरेज का समर्थन करती है। भारत के बाहर के पाठक शायद यह समझते होंगे कि अरेंज्ड मैरेज भारतीय समाज की एक प्रथा है जिसमें युवा जोड़ियाँ अपनी मरज़ी से अपने माँ-बाप और परिवार के बड़े-बूढ़ों की सत्ता को मानती हैं और ये लोग उनके लिए सही “रिश्ता” ढूँढ लेते हैं। कुछ लोग शायद इसे ऊँचे आदर्शों से भी जोड़ लें। यह सब कहानियों की बातें हैं। लेकिन असल में अरेंज्ड मैरेज एक सजातीय विवाह है। इसका मतलब यह एक ही जाति के दो लोगों की शादी है जो परिवारों के “रक्षकों”—जिसमें माँ-बाप, चाचा-चाची, बड़े-बूढ़े, दूर तक के रिश्तेदार सभी शामिल हैं—ने तय किया है, जो ये सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके वंश का ख़ून किन्हीं नीची जातियों या भगवान न करे उन जातियों के ख़ून से कभी गंदा ना हो जिन्हें पहले अछूत कहा जाता था।

इन साफ़-सुथरी पारिवारिक फिल्मों के वजूद की एक वजह है – भारत की सबसे ऊँची जाति, या हिन्दू “द्विज”—जो जनसंख्या में 18 प्रतिशत हैं—ने बॉलीवुड पर अपना प्रभाव जमाए रखा है और उसने अपनी स्वयं की संकुचित, संभ्रांत और स्थिर जातीय संस्कृति को पूरे भारत के जीवन के एक मखौल जैसे नमूने की तरह हमेशा पेश की है। (असल में तो ये पंजाबी खत्री जाति की शादियाँ हैं जिनको भारतीय विवाह प्रथा की तरह दिखाया जाता है।) इन शादियों में जो खान-पान, कपड़े, आलीशान घर, सजधज, गलीचे, साड़ी, सिन्दूर, त्यौहार दिखाए जाते हैं, जिन देवताओं की पूजा की जाती है, ये सब बस प्रबल जाति की दुनिया से मेल खाते हैं। बॉलीवुड में दलितों (वो जातियाँ जिन्हें पहले अछूत कहा जाता था), आदिवासियों (मूल निवासी) या पिछड़ी जाति के हिन्दुओं की संस्कृति या इनके वजूद तक का कहीं शायद ही ज़िक्र होता है जबकि भारत की जनसंख्या में इन लोगों का 70 प्रतिशत का हिस्सा है। अलगाववाद की यह संस्कृति उस घातक यथापूर्व स्थिति को बरक़रार रखती है जहाँ “द्विज” जातियों के सदस्य अपनी जाति व्यवस्था के कुलीनतंत्रीय लाभ उठाते रहते हैं और सजातीय शादियों के ज़रिए अपने वंशजों को—ख़ासकर लड़कियों को—अपने गुने से बाहर नहीं जाने देते हैं लेकिन जिस संरचनात्मक हिंसा पर ये शादियाँ टिकी हैं उसे वो छिपाकर रखते हैं।

शायद इससे ज़्यादा बुरी बात यह है कि जब कभी बॉलीवुड परिवार से दूर लव मैरेज (प्रेम विवाह) को दिखाता भी है तो वह जातीय पृष्ठभूमि की तरफ़ तो आँखें मूँद लेता है, जब लोग असली ज़िन्दगी में प्रेम विवाह की जुर्रत करते हैं ख़ासकर जातियों के दायरों के बाहर तब लव मैरेज में होने वाली सारी गड़बड़ी और हिंसा की तो बॉलीवुड में कोई जगह ही नहीं है। बॉलीवुड की रंगीन सपनों की दुनिया के ठीक विपरीत काफ़ी डरावनी सच्चाई तो यह है कि भारत के गाँव-देहातों में आज भी अंतर्जातीय संबंध दिल दहलाने वाले दंगों और शांति-सुरक्षा के नाम पर किए गए हिंसात्मक हमलों का कारण बन सकते हैं। (प्रेस में अक्सर इन्हें व्यंजनात्मक रूप से “ऑनर किलिंग” बुलाया जाता है।) ज़्यादातर इसका कहर निचली जाति के सदस्य पर पड़ता है, कभी-कभी तो सबल जाति के सदस्य के परिवार के हाथों उसे मौत के घाट भी उतार दिया जाता है। जब मैं यह लिख रहा हूँ, मेरी फीड में एक समाचार-शीर्षक अचानक उभर आता है। लिखा है – “एक दलित पुरुष को प्रेम करने वाली एक महिला की उसकी माँ-बाप, भाई द्वारा हत्या”। किसी दलित पुरुष के साथ रिश्ता होने की वजह से उसके परिवार वालों ने ही उसका गला घोंट दिया। जाँच अधिकारी के अनुसार, “भारती की माँ रश्मि ने उसकी छाती पर बैठकर उसके चेहरे को एक तकिए से ढँककर उसे मार डाला जबकि मनीष ने उसके हाथ पकड़ रखे थे। उसके मरने के बाद उसके पिता और भाई ने मिलकर उसके शरीर को उसके कमरे में ऊपर से लटका दिया ताकि ऐसा लगे उसने आत्महत्या की हो।” यह घिनौनी हत्या सिर्फ परिवार के ख़ून को शुद्ध रखने के लिए की गई थी और जिसे बेटी की ज़िन्दगी से ज़्यादा ज़रूरी समझा जाता है। एक दलित के शरीर का द्रव्य पूरी वर्ण व्यवस्था के लिए ख़तरा है।

ऐसी बर्बरता की घटनाओं का बेबाक होते रहना हमें सवाल उठाने के लिए मजबूर करना चाहिए – अरेंज्ड मैरेज से जुड़े तथाकथित “परंपरागत” आदर्शों पर, या जहाँ तक ये बात जुड़ी है – बॉलीवुड के द्वारा अँधेरे में छिपाई गई इस सच्चाई पर। कुछ भी कह लें लेकिन आप भारतीय समाज को तब तक नहीं समझ सकते जब तक आपकी समझ की पकड़ अरेंज्ड मैरेज पर ना हो, जो दुर्भाग्य से सभी प्रकार के वर्गों में प्रचलित है। ताज हॉटेल ग्रुप के द्वारा हाल ही में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार 75 प्रतिशत युवा भारतीय अरेंज्ड मैरेज के पक्ष में हैं। और उत्तर भारत में 82 प्रतिशत महिलाएँ यह चाहती हैं कि उनके माता-पिता ही उनके लिए उनका जीवन साथी चुनें। इन लाखों अभागों के लिए आगे कैसा विवाहित जीवन रखा है? इनके बड़ों ने इनके लिए कैसी यातनाएँ तैयार कर रखीं हैं? चलिए, मैं आपको एक गाइडेड टूर पर ले चलता हूँ।

प्यार का बाज़ार

अरेंज्ड मैरेज अलग-अलग रूपों में आती है। सबसे सीधे तौर पे आपके परिवार, या जाति, या किसी धार्मिक-सांस्कृतिक ग्रुप (जिससे आपका परिवार जुड़ा हो) के बड़े-बुज़ुर्ग इसे तय कर लेते हैं। अक्सर दोनों लोगों की जन्मपत्रियाँ मिलाई जाती हैं यह देखने के लिए कि यह रिश्ता ठीक फ़िट है या नहीं। कई दिल तो जन्मपत्रियों के न मिलने पर टूटते हैं। एक अंधविश्वासी समाज की ये सारी करामातें हैं।

अगर आपका परिवार-समाज आपके लिए सही जोड़ा ना ढूँढ पाए तो फिर विवाह मेले भी होते हैं जहाँ बेटे-बेटियों की जागीर-जायदाद की तरह नुमाइश की जाती है। (हाल ही में लंदन रिव्यु ऑफ़ बुक्स में युन शेंग ने जो चाइनिज “मैरेज मार्केट” का वर्णन किया था, यह उससे ज़्यादा अलग नहीं है।)

अरेंज्ड मैरेज के लिए जोड़ा ढूँढना भारत में एक बड़ा व्यापार बन गया है जो प्राचीन पक्षपात और पूँजी के वैश्विकरण के अपवित्र गठबंधन का एक उदाहरण है।

लेकिन ये सारे “परंपरागत” तरीके आजकल के अरेंज्ड मैरेज के जुगाड़ के मॉडर्न तरीकों के सामने कुछ नहीं हैं। कोई भी भारतीय अख़बार खोलकर देखिए और आपको एक-दो पन्ने शादी की इश्तिहारों के लिए रिज़र्व मिल ही जाएँगे। बड़ी ही बेशर्मी से वह पन्ना जात-बिरादरी के आधार पर छोटे-छोटे बक्सों में बँटा मिलेगा ताकि आपको अपने ही “समुदाय” का कोई मिल जाए और आप किसी भी तरह के प्रदूषण से बचे रहें। इस तरह की मूर्खता से लड़ने के लिए भारत का सबसे बड़ा अंग्रेज़ी दैनिक अख़बार, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, शादी के उन इश्तिहारों पर 25 प्रतिशत की छूट देता है जो जाति या जाति-आधारित पसंद का ज़िक्र नहीं करते हैं। यहाँ तक कि उन्होंने अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए “कास्ट नो बार” वाले शीर्षक के साथ इश्तिहारों का एक अलग ही सेक्शन भी बना दिया है। पर ऊँची जाति वाले भारतीयों ने इसमें भी एक सुराग निकाल लिया है। “कास्ट नो बार” वाले सेक्शन में इश्तिहार डालने वाले कुछ लोग बड़ी चालाकी से अपने कुलीन साथियों के लिए अपनी जाति का इशारा इश्तिहार में डाल देते हैं। “कास्ट नो बार” सेक्शन में एक काफ़ी अनुचित इश्तिहार “केवल अपर-कास्ट” शीर्षक के साथ छपा था। (इस विरोधाभास को शायद इस तरह से समझाया जा सकता है कि ‘अपर कास्ट’ या “ऊँची जाति” के अंदर अनगिनत जातियाँ आ जाती हैं।) इस तरह का भेदभाव खुल्लम खुल्ला काफ़ी नीच हो सकता है, जैसे एक आवेदक “एस सी / एस टी के अलावा जाति कोई बाधा नहीं” के शीर्षक के नीचे अपना प्रस्ताव रखता है। (एस सी का मतलब है अनुसूचित जातियाँ जो पहले की नीची जातियों के लिए प्रशासनिक शब्द है और इसी तरह एस टी का मतलब है अनुसूचित जनजातियाँ जो आदिवासियों के लिए प्रयोग किया जाता है।)

अरेंज्ड मैरेज में जोड़ा ढूँढने के लिए अब तो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धि) या एआई का भी इस्तेमाल हो रहा है। हाल के कुछ सालों में कई मैट्रिमोनियल वेबसाइट खुल गई हैं—”भारत मैट्रिमोनी” और “शादी डॉट कॉम” इनमें शायद सबसे ज़्यादा मशहूर हैं—जो अपने एडवांस्ड फ़िल्टर्स की मदद से जाति, वंश और रिश्तेदारी के महीन जालों को भी सँभाल सकती हैं। ये वेबसाइट छोटे-बड़े शहरों में किसी के लिए जाति के दायरों से गुमनाम रूप से बाहर निकलने के लिए एक अच्छा मौका हो सकती हैं। इसके विपरीत ये भी बर्बर वैदिक आदर्शों को मूर्त रूप देने का एक नया ज़रिया बन गई हैं। मानो यह प्राचीन पक्षपात कम था, अब आई आई टी और आई आई एम (जो भारत की उच्चतर शिक्षा संस्थानों में कम से कम दिखावे के लिए सबसे उम्दा माने जाते हैं) के अलग-अलग ब्रांचों के ग्रैजुएटों के लिए विशेष रूप से समर्पित मैट्रिमोनियल वेबसाइट भी खुल गई हैं। जाति और वर्ग की शान को बरक़रार रखते हुए मानो ताने मारते हुए इनकी टैगलाइन घोषणा करती है – “अल्मा मैटर मैटर्स” (अपना कल्ज मायने रखता है)।

सब मिलाजुला कर देखें तो अरेंज्ड मैरेज के लिए जोड़ा ढूँढना भारत में एक बड़ा व्यापार बन गया है जो प्राचीन पक्षपात और पूँजी के वैश्विकरण के अपवित्र गठबंधन का एक उदाहरण है। (ए आई इसमें एक सामूहिक बड़े-बुज़ुर्ग की भूमिका अदा कर रहा है।) ‘दी इकोनॉमिस्ट’ की एक हाल की रिपोर्ट के अनुसार भारत में अरेंज्ड मैरेज से सम्बंधित शादी का यह व्यापार सालाना 50 अरब डॉलर का है, और किसी भी पल कुल 6.3 करोड़ लोग अपने लिए एक हर्षहीन रूखे भविष्य की तलाश में तत्परता से जुटे हैं। ऐसा भी नहीं है की यह पिछड़ी प्रथा सिर्फ मातृभूमि तक सीमित हो। विदेशों में बसे कई भारतीय प्रोफ़ेशनल भारत की एक ट्रिप लगाते हैं और जल्दी से जल्दी जितने सारे विकल्प देख सकें देखकर एक संभव दूल्हा या दुल्हन के साथ वापस उड़ान भर लेते हैं। (न्यू जर्सी के लोगों ने तो कई ऐसों को देखा ही होगा !) अमेरिका में आई टी में काम करने वाला मेरा एक दोस्त हर छह महीने भारत जाता है – उनसे मिलने जिनसे उसकी मुलाक़ात इंटरनेट पर हुई हो और वो जिन्हें उसके परिवार ने खोजकर रखा होगा। उसे यह सौदा तय करने में तीन साल लगे। इसके पीछे उसकी उम्र भी थोड़ा कारण थी। वह कोई तीस का रहा होगा और उसे चिंता थी कि उसे बिलकुल अपनी आशा के अनुसार ही उत्तम प्रकार की मिले। इसमें भी कोई शक़ नहीं कि उसके पक्षपाती माँ-बाप को इसकी भी बड़ी ख़ुशी थी कि उनका बेटा ‘गे’ नहीं था।

यह कहने की वैसे ज़रूरत तो नहीं कि अरेंज्ड मैरेज का जुल्म ज़्यादातर तो महिलाओं को सहना पड़ता है। अरेंज्ड मैरेज की अर्थव्यवस्था में एक बच्ची को ‘पराया धन’ माना जाता है, जो उसे एक ऐसे ऋण या निवेश में तब्दील कर देती है जिसे बस भविष्य में दूल्हे के परिवार को लौटाना होता है जहाँ उसकी सच्ची जगह मानी जाती है। इंडियन ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे से पता चला कि भारत में सिर्फ 5 प्रतिशत दुल्हनों ने अपना पति खुद चुना था। सिर्फ 55 प्रतिशत परिवारों ने जोड़ा तय करने के पहले अपनी बेटियों की राय तक पूछी थी; 65 प्रतिशत दुल्हनों ने शादी के दिन या उसके आसपास ही अपने पति को पहली बार देखा या उससे पहली बार मुलाक़ात की; और वो जो अपने साथी को शादी से पहले कम से कम 3 महीने से जानतीं हों मात्र 15 प्रतिशत थीं। और तो और, सर्वे में शामिल शिक्षित महिलाओं में 62 प्रतिशत ने अपने साथी से शादी के पहले कभी कोई संपर्क नहीं किया था।

कुल मिलाकर अरेंज्ड मैरेज सेक्सुआलिटी, चाहत और विकल्पों पर एक पूरे नियंत्रण का प्रतीक है। कुल मिलाकर अरेंज्ड मैरेज सेक्सुआलिटी, चाहत और विकल्पों पर एक पूरे नियंत्रण का प्रतीक है। युवाओं के लिए यह एक गाइडबुक है यह सिखाने के लिए कि पूर्वनिर्धारित जीवन कैसे जिएँ, एक अदृश्य पहरेदारी (पनोप्टिकॉन) है यह सुनिश्चित करने के लिए कि वे कभी अज्ञात की तरफ ना भटकें।

फिर यह सब उचित कैसे है? अगर आप बड़ों से पूछो कि वो अपने बच्चों के लिए जीवनसाथी ढूँढने की ज़हमत क्यों उठाते हैं तो ज़वाब दबे-दबे पोशीदे लहज़ों में मिलेगा। कई कहेंगे कि अपनी जाति-संस्कृति में शादी करना आसान होता है – आदतें, खान-पान, रीति-रिवाज, धर्म-संस्कार मिलते हों तो एक अपरिचित के घर में रहना आसानी से हो सकता है। (अपरिचित से यहाँ मतलब उस परिवार से है जिसमें लड़की की शादी हुई हो।) कुछ लोग तो यहाँ तक कहेंगे कि जाति के रिश्ते की वजह से दोनों परिवारों के सदस्यों के बीच मेलजोल का सम्बन्ध रखना आसान होता है। आप इनके तर्कों के बारे में कुछ भी सोचें, यह बिलकुल सच है कि अरेंज्ड मैरेज पूरे परिवारों के बीच नाकि सिर्फ दो लोगों के बीच का सम्बन्ध है। आख़िरकार एक हाल का सर्वे बताता है कि भारत में 95 प्रतिशत दम्पति शादी के बाद अपने माता-पिता और विस्तृत परिवार के साथ रहते हैं। लगभग 70 प्रतिशत 10 या अधिक सालों से परिवार के साथ हैं। यह उस तरह का माहौल पैदा करता है जहाँ दम्पति के हर छोटे-बड़े फ़ैसले (आपको बच्चे कब चाहिए, कितने चाहिए, इत्यादि) पर परिवारवालों का भारी प्रभाव पड़ता है। शादी तो इस दृष्टि से देखें तो यह पारिवारिक अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा मात्र है। भारत में जातीय अरेंज्ड मैरेज एक व्यक्ति के लिए अपने समाज और अपने परिवार की अभिलाषा को पूरी करने का ज़रिया है। इस सदियों पुराने रिवाज का भारी बोझ युवा पीढ़ी को उठाना पड़ता है।

मनुवादी आदिम मानव

अब तक आप काफ़ी डर गए होंगे। ऐसा कैसे हो सकता है कि भारत में—उस देश में, जो शायद आपके दिमाग में आध्यात्मिकता, हाथियों और रंगीन कपड़ों से जुड़ा है—विवाह का एक स्पष्ट रूप से ऐसा वर्गीकृत और सामंतवादी रूप आज भी कायम है? भारत आज जहाँ है वहाँ कैसे पहुँचा, इसे समझने की शुरुआत करने से पहले आपको जाति व्यवस्था के बारे में थोड़ा सीखना होगा, जो वह बुनियादी सामाजिक व्यवस्था है जिस पर यह पिछड़ा देश टिका है।

आम तौर पर यह माना जाता है कि जाति व्यवस्था की शुरुआत शास्त्रीय हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में मिलती है। भगवदगीता में प्रभु कहते हैं कि वह स्वयं चतुर्वर्ण—चार वर्णों की सामाजिक व्यवस्था—के संस्थापक हैं, जो समाज को मोटे तौर पर चार जातियों में बाँटती है – ब्राह्मण (ऊँचे पंडित-पुजारी), क्षत्रिय (सैनिक-योद्धा), वैश्य (व्यापारी) जो सामान्यतया बनिया कहलाते हैं, और शूद्र (किसान-मज़दूर)। इन चार वर्णों के साथ ही हज़ारों जातियाँ (या समुदाय) हैं और हर एक किसी ख़ास व्यवसाय-धंधे (मछुआरे,माली, शिक्षक, आदि) से जुड़ी हुई है। कुछ “अछूत” जातियाँ भी थीं—मतलब कई जातियों, उपजातियों का एक जाति समूह—जिन्हें परंपरा के अनुसार मजबूर किया जाता रहा है कि वो सबसे अपमानजनक और “गंदे” व्यवसाय करें, और जिन्हें नाम मात्र के लिए वर्ण-व्यवस्था से भी बाहर माना जाता है।

अरेंज्ड मैरेज सेक्सुआलिटी, चाहत और विकल्पों पर एक पूरे नियंत्रण का प्रतीक है। युवाओं के लिए यह एक गाइडबुक है यह सिखाने के लिए कि पूर्वनिर्धारित जीवन कैसे जिएँ।

जाति और वर्ग में समानता है क्योंकि जाति श्रम का एक क्रूर विभाजन है और यह अधिकारहीनों की कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाती है। द्विज जातियाँ—ब्राह्मण,क्षत्रिय और बनिया—आर्थिक उत्पादन पर सख़्ती से नियंत्रण रखकर इस कठोर संरचना में बलपूर्वक निर्धारित उत्पादक संकायों पर अपना वर्चस्व बनाए रखती हैं (भारतीय अर्थव्यवस्था पर आज भी उनका ज़बरदस्त नियंत्रण है)। फिर भी जातीय हिंसा का एक सैद्धांतिक हिस्सा भी है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह अधमता पर आधारित वर्गीकरण की एक व्यवस्था है, जिसमें “प्रदूषण” और “पवित्रता” जैसी धारणाएँ काफ़ी मायने रखती हैं, जिसकी सीढ़ी के हर पाये पर खड़े लोग अपने नीचे खड़े लोगों को तुच्छ समझते हैं, उन्हें लताड़ते हैं। जाति की सीढ़ी के सबसे नीचे वाले लोगों की प्रदूषित काया को सचमुच में समाज से बहिष्कृत किया गया था—उन्हें मन्दिरों जैसी पवित्र मानी जाने वाली जगहों में आना मना था, उन्हें राजनैतिक और सांस्कृतिक विचार-विमर्श से दूर रखा गया था, यहाँ तक कि सामूहिक श्मशानों में भी उनके लिए जगह नहीं थी। उन्हें बेहद बर्बर तरीकों से ज़लील किया जाता था; सवर्ण हिन्दुओं का ऐसा विश्वास था कि इन लोगों में नाना प्रकार की अशुद्धियाँ हैं। काफ़ी ज़्यादती वाले मामलों में तो एक दलित की परछाईं, पीकदान और उसकी नज़र भी अपवित्र मानी जाती थीं; इन दायरों को लाँघने की कोशिश करने वाला कोई भी दलित सवर्ण हिन्दुओं की हिंसा का शिकार हुआ करता था और आज भी हुआ करता है। वह मानों राज्य की अनधिकृत पुलिस की तरह काम करते हैं जो अपनी ग़ैरसरकारी ग्राम सभाओं—खप पंचायतों—के ज़रिये ही सारी स्थानीय गतिविधियाँ चलाना पसंद करते हैं और इनका प्रभाव एक व्यक्ति के निज़ी मामलों में भी सरकारी संस्थाओं से कहीं ज़्यादा है। हिंसा का ठप्पा तो दलितों के शरीरों पर एक स्थाई निवासी बन चुका है।

जाति व्यवस्था महिलाओं के उन श्रेणीबद्ध अत्याचारों की बुनियाद पर खड़ा था जिनका विदुषी उमा चक्रवर्ती “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” कहकर वर्णन करती हैं। इस सामाजिक संरचना का जन्म भारतीय उपमहाद्वीप पर हुए आर्यों के आक्रमण के आसपास हुआ जिसके बाद “आदिवासी” जनता—पुरुष और महिला—पर अधिकार जमाया गया, उन्हें दास बनाया गया और जिन्हें समय बीतते “निचली जाति” के समुदायों में तब्दील कर दिया गया जबकि आर्य ऊँची जाति के बन गए। एक प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ, ऋग्वेद, में चक्रवर्ती को एक प्रकार की यौनिक दासता का प्रमाण मिलता है जिसमें अलग-अलग जातियों की महिलाओं को विभिन्न श्रमिक कार्य आवंटित किए गए थे। जो इनमें सबसे ऊँची श्रेणी में थीं—ब्राह्मण महिलाएँ—उनके अस्तित्व का केवल एक ही प्रयोजन था, ऊँची-जाति के वंशज पैदा करना। प्रबलता के इस रीतिबद्ध अनुक्रम में आर्य महिलाओं को फ़ायदा था। दास-दासियाँ और ढोर-मवेशी पर उनका ही हक़ था। सबसे नीची जाति वाले बंदी आदिवासी जन दूसरों के दास थे। वहीं दूसरी तरफ हर तरह की चाकरी वाले कामों से जुड़ी होने के कारण निचली जातियों की स्त्रियों को तो अपवित्रता का स्रोत माना जाता था। इस हालात में ऊँची जाति के पुरुषों के लिए निचली जाति में विवाह की संभावना बड़ी भयावह थी क्योंकि गैर-जातीय यौन सम्बन्ध से जाति की पवित्रता को ख़तरा था। इस भय को उन्होंने उन धार्मिक नियमों में बाँध दिया जिनके अनुसार शूद्रों पर अपने से ऊपर वाले लोगों के साथ विवाह करने पर कड़ा प्रतिबन्ध था।

इसका यह मतलब नहीं था कि अंतर्जातीय संभोग नहीं होता था। इसके विपरीत ब्राह्मण पुरुषों के लिए तो सभी जातियों की स्त्रियाँ निस्संदेह उनकी पहुँच में थीं – बस इतना था कि इस तरह का मिलाप, जो अक्सर बलात्कार के रूप में होता था, विवाह की ओर कभी नहीं जाता था। काफ़ी ज़्यादती तो वहाँ होती थी जहाँ एक तरह की जागीरदारी जैसी व्यवस्था में ऊँची जाति के मालिक निचली जातियों की स्त्रियों का बलात्कार करते थे और अपने भविष्य के लिए दास-श्रम पैदा करते थे। असल में बारहवीं सदी तक भारत के कुछ ग्रामीण इलाकों में दलित दुल्हनों को अपने वैधानिक रूप से विवाहित पति के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने से पहले भी ऊँची जाति के ज़मींदारों के बलात्कार को सहना पड़ता था। एक दलित स्त्री का बलात्कार का मतलब था उसके परिवार की मान-प्रतिष्ठा पर पूर्ण नियंत्रण। इस तरह मालिक अपने दास-चाकर के परिवार की रूह पर अपना कब्ज़ा जमा लेता था। आदमी ने अपनी इज्ज़त खो दी थी क्योंकि उसकी औरत को किसी और ने जूठा कर छोड़ दिया था। उसके गुस्से को ख़ामोश करके मालिक उत्पीड़ितों के शरीरों पर अपनी जागीर बार-बार बनाता है, जो उसके शोषण का एक स्थायी स्तम्भ बन जाती हैं। गहराई से देखें तो जाति औरतों के शरीरों के भीतर और ऊपर बनी-खड़ी है। जाति का निर्वाहन किसी के शरीर के पर ही होता है।

हाँलाँकि पिछले हज़ारों सालों में भारतीय समाज निश्चित रूप से बहुत बदल गया है और हर तरह का जातिवाद देश के संविधान द्वारा वर्जित है, लेकिन फिर भी यह चौंकाने वाली और बेहद निराशाजनक बात है कि आज भी देश की संस्कृति और राजनीतिक ढाँचा काफ़ी हद तक जाति की परंपरागत सीमाओं में बंधें हैं।

पश्चिमी गुजरात की एक दलित संस्था नवसर्जन की 2010 की रिपोर्ट में दिखाया गया है कि वहाँ एक सर्वे में शामिल 98.4 प्रतिशत गाँवों में अंतर्जातीय शादियों की इजाज़त नहीं है। और ऐसा 1954 की स्पेशल मैरेज ऐक्ट के प्रावधानों और भारत सरकार के अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन देने (अंतर्जातीय दम्पतियों को आर्थिक पुरस्कार के रूप में) के बावजूद है। NCAER (नेशनल कॉउंसिल फॉर एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च) और यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेरीलैंड द्वारा किए गए इंडिया ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे के अनुसार भारत में शहरी और ग्रामीण इलाकों में केवल 5 प्रतिशत शादियों को अंतर्जातीय माना जा सकता है। इनमें गोत्र के अंदर ही की गई शादियाँ भी शामिल हैं। यही सर्वे यह भी बतलाता है कि ग्रामीण भारत में 30 प्रतिशत लोग और शहरी इलाकों में 20 प्रतिशत लोग स्वीकार करते हैं कि वे छुआछूत (अस्पृश्यता) मानते हैं। और आज भी कई गाँव जातिवादी बुज़ुर्गों द्वारा चलाई जाने वाली ग़ैर-सरकारी ग्राम सभाओं (जिन्हें खप पंचायत बुलाया जाता है) के अनुसार ही चलते हैं और व्यक्तिगत मामलों में इनका प्रभाव सरकारी संस्थाओं के मुक़ाबले कहीं ज्यादा है। यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि दलित दुल्हनों को जाति के इन काँटेदार तारों में अभी वह स्वायत्तता कहीं नहीं मिली है।

इस बर्बरता के बीच कभी-कभी कुछ दुःखद कॉमेडी के किस्से भी सुनने में आते हैं। उत्तर प्रदेश का अभी एक हाल का मामला देखिए जहाँ एक हिन्दू-फ़ासिस्ट राजनीतिक दल – भारतीय जनता पार्टी – के एक ब्राह्मण प्रदेश-विधायक राजेश मिश्रा की चौबीस-वर्षीय बेटी साक्षी मिश्रा एक उनतीस-वर्षीय दलित युवक अजितेश कुमार से प्यार कर बैठी। रिश्ते की जानकारी मिलते ही साक्षी के पिता ने इसकी सार्वजनिक रूप से निंदा की और उनको उस क्षेत्र की पूरी मिश्रा जाति का समर्थन मिला। उसने तो यहाँ तक कि साक्षी को जान से मारने की धमकियाँ भी जारी कीं और मालूम होता है कि अजितेश को ख़त्म करने के लिए गुंडे भी भेजे गए।

पर कहानी के अगले साहसिक मोड़ में साक्षी और अजितेश दोनों उस क्षेत्र से भाग निकले और सोशल मीडिया पर जाकर पुलिस-सुरक्षा की माँग की। जिस कार में वो निकले थे उसकी पिछली सीट पर बैठी साक्षी ने वीडियो में, जो तुरंत सोशल मीडिया में व्हायरल (लोकप्रिय) हो गया, कहा – “मैं ख़ुश रहना चाहती हूँ और आज़ाद रहना चाहती हूँ।” अजितेश के परिवार के बचाव में अपने कट्टर पिता को संबोधित करते हुए उसने यह भी कहा, “वो इंसान हैं। वो जानवर नहीं हैं।” “आपको अपनी सोच बदलनी होगी। वो अच्छे लोग हैं। मैं उनके साथ ख़ुश रहूँगी।” एक दलित युवक ने एक ब्राह्मण युवती की सेक्सुआलिटी को आकर्षित करने की जो ज़ुर्रत की, इसने जातिवादी समाज के कहर को उकसाया। ब्राह्मण स्त्रियों का पवित्र ओहदा जिसे मानों हमेशा सुरक्षा की ज़रूरत है, परिवार की प्रतिष्ठा का मानक है। उस मान-प्रतिष्ठा को लेकर अजितेश ने एक घातक ग़लती की है और इसलिए उसके साथ उस युवती का भी मरना जरूरी है।

ऐसे अंतर्विरोध उन वचनबद्ध रिश्तों में जन्म लेते हैं जहाँ हर किसी से यह आशा की जाती है कि वह मरते दम तक बस एक व्यक्ति के साथ ही रहे और यहाँ तक कि सात जन्मों तक एक ही पति के साथ रहने की कसमें खाई जाती हैं। सफ़र में उतार-चढ़ाव तो संभव है ही लेकिन अक्सर इसे जोड़े में से किसी एक के दोष के रूप में देखा जाता है। भारत में जाति में बँधे समाज में पुरुष-स्त्री दोनों ही डिवोर्सड महिलाओं को निचली नज़र से देखते हैं, यहाँ तक कि उसके परिवार वाले भी। उनकी स्वायत्तता तो उन भारतीय आदर्श मूल्यों के लिए और भी बड़ा ख़तरा बन जाती है जिनके इतिहास में विधवाओं को पति की चिता में जला दिया जाता था (जिसे सती कहते हैं) या उनके सर मुँडवा कर उन्हें कुरूप बना दिया जाता था। बी आर अंबेडकर 1916 में एंथ्रोपोलॉजी के अपने एक लेख “भारत में जाति” में कहते हैं कि ऐसी व्यवस्था “अतिरिक्त महिलाओं” को जन्म देती है जो वैवाहिक संबंधों में नहीं हैं या विधवा हैं और जो जातिवादी समाज के लिए एक ख़तरा हैं। इसलिए उन्हें निर्वासित कर दिया जाता है—समाज में अछूत मान लिया जाता है।

जाति
© Pragun Agarwal

सभ्यता के विरुद्ध एक युद्ध

नवीन भारत में यदि कोई सामाजिक प्रगति हुई है तो वह सिर्फ उन दलित और निचली जाति के नेताओं के अनवरत प्रयासों की वजह से है जो हमेशा नारी-मुक्ति के लिए प्रतिबद्ध रहे हैं (और जो कई बार अपने इन प्रयासों की वजह से तथाकथित राष्ट्रीय आंदोलन के उस ऊँची जाति के नेता के ख़िलाफ़ खड़े हुए जो “परंपरा” के नाम पर हर प्रकार की हिन्दू धर्मांधता को बचाए रखना चाहता था)।

उन्नीसवीं सदी के निचली-जाति के सुधारकों में लोग आज शायद महाराष्ट्र के ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले को सबसे ज़्यादा जानते हैं। ज्योतिबा, जो पुस्तिकाएँ छापने वाले एक सक्रियतावादी कार्यकर्ता थे और जो थॉमस पैन को अपना हीरो मानते थे, हिन्दू ब्राह्मणवादी रूढ़िवादिता के एक तीखे और पथ-प्रदर्शक आलोचक थे। अपनी पत्नी के साथ उन्होंने स्त्री-शिक्षा—हिन्दू धर्मांध उस समय जिसके बिलकुल विरुद्ध थे—के क्षेत्र में अनोखा काम किया। उन्होंने लड़कियों के लिए और अछूत बच्चों के लिए पहली बार स्कूल खोले और ब्राह्मण महिलाओं की विवाहेतर संतानों के लिए एक अनाथालय भी खोला (रूढ़िवादिता के डर से ऐसे कई बच्चों को कहीं छोड़ दिया या यहाँ तक कि मार भी दिया जाता था)। वो दोनों विधवा विवाह के भी कट्टर समर्थक थे।

जाति की सीढ़ी के सबसे नीचे वाले लोगों की प्रदूषित काया को सचमुच में समाज से बहिष्कृत किया गया था—उन्हें मन्दिरों जैसी पवित्र मानी जाने वाली जगहों में आना मना था।

अगली पीढ़ी में से, ब्राह्मणवाद के विरोध में “स्वाभिमान” आंदोलन के जनक माने जाने वाले दक्षिण भारतीय विचारक “पेरियार” ई व्ही रामास्वामी नाईकर भी इसी तरह महिलाओं के अधिकारों के एक प्रबल समर्थक थे। एक के बाद एक पुस्तकों में उन्होंने ब्राह्मणवादी ग्रंथों की तर्कहीनता दिखाई और कई और चीज़ों के अलावा महिलाओं के अधिकारों—विवाह के लिए अपने साथी के चुनाव की पूरी आज़ादी, अपनी मर्ज़ी से तलाक़ का अधिकार, गर्भनिरोध का उपयोग करने का अधिकार ताकि बच्चों और परिवार के परे भी उनकी एक ज़िन्दगी हो— का जोरदार समर्थन किया। असल में पेरियार की पहली क़िताब गर्भ निरोध पर ही थी। उनका मानना था कि गर्भावस्था एक दुर्भाग्य है जो महिलाओं को एक “स्वतंत्र रूप से ज़िन्दगी जीने” से रोकता है।

पेरियार की ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की आलोचना संगठित राजनीति तक भी जाती है। पेरियार परिवार नियोजन के कट्टर समर्थक थे जिसे वो रूढ़िवादी धर्म और प्रथा का सबसे बढ़िया इलाज समझते थे। उनका प्रस्ताव था कि सरकार साँझे चूल्हे और छोटे बच्चों की देखभाल के लिए केंद्र खोले जिससे खाना बनाने और बच्चों की देखभाल के कामों को समाज में बाँटा जा सके। वे एक पक्के आधुनिकवादी (मॉडर्निस्ट) थे और उन्होंने पश्चिमी देशों को मिसाल के तौर पर देखते थे जिन्होंने रूढ़िवादी विरोध के बावजूद परिवार नियोजन को बढ़ावा दिया था। वे लिखते हैं, माँ-बाप जैसे-जैसे “ज़्यादा बच्चों को जन्म देते हैं, वैसे ही उनकी सहूलियतें और सुविधाएँ कम होती जाती हैं।” “ठीक इसी तरह, अगर एक देश में जनसंख्या बढ़ती चली जाए तो उस देश को निश्चित ही भूखमरी, गरीबी और एक आम ज़िन्दगी की जरूरतों की कमी का सामना करना पड़ेगा।” मतलब यह कि बड़े परिवार एक लोकहितकारी राज्य की तैयारी में एक अड़चन हैं। (कहीं और उन्होंने कुछ ज्यादा ही खीझ के साथ लिखा था, “बच्चे सार्वजनिक जीवन के लिए सरदर्द हैं। “) पेरियार का आमूल परिवर्तनवाद आगे चलकर को भी अनुमति देता है क्योंकि उनके अनुसार विवाह और “पवित्रता” मुख्य रूप से पितृसत्तात्मक और नारी-विरोधी संस्थाएँ थीं। उनकी लिंगवाद (सेक्सिज़्म) के प्रति नफ़रत बस उनकी जातिवाद के प्रति नफ़रत की ही बराबरी कर सकती थी।

लेकिन फिर भी ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की जड़ों पर आघात करने में सबसे आगे थे भारत के सबसे आधुनिक बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ बी आर अंबेडकर। अंबेडकर एक काफ़ी बड़ी शख़्सियत हैं। बॉम्बे राज्य से कॉलेज से ग्रेजुएट होने वाले पहले अछूत, अपनी जाति से भारत से ग्रेजुएट पढ़ाई करने भी सबसे पहले—और वो भी कोलंबिया से—अंबेडकर “दलित” आंदोलन के जनक हैं और शायद आज भारत में सबसे ज़्यादा सम्मानित बुद्धिजीवी भी। वो एक बहुश्रुत (पॉलीमैथ) और बहुभाषी थे जिन्होंने अनेक विषयों का अध्ययन किया था—मानव-शास्त्र, समाज-शास्त्र, अर्थशास्त्र और धर्म से लेकर फ्रेंच इतिहास और अँग्रेज़ी साहित्य तक। (कोलंबिया में अपने बिताए कुछ सालों में उन्होंने कुल मिलाकर साठ कोर्स (विषय) लिए थे। 1915 में कोलंबिया से अपनी MA पूरी करने के बाद (जहाँ उन्हें ड्यूई से भी पढ़ने का भी मौका मिला), 1916 में उन्हें LSE से D.Phil. मिली, और वो फिर 1928 में एक और डॉक्टरेट के लिए कोलंबिया वापस चले गए। इस अवधि के बाद वो भारत वापस लौटे और एक ऐसे राजनैतिक जीवन की शुरुआत की जिसने देश का चेहरा बदल डाला। ना सिर्फ उन्होंने बिना थके निचली-जाति के सामाजिक और राजनैतिक आन्दोलनों को कई तरह के प्रयासों—अख़बारों का संपादन, मज़दूरों का संगठन, नई पार्टियों का गठन, चुनाव लड़कर—के ज़रिए बढ़ाया और सँभाला, उन्होंने स्वाधीन भारत के संविधान को भी आकार दिया, और इन सबके साथ-साथ हर रात गहन शोध करते हुए क़िताब पर क़िताब लिखते गए (और स्वाधीनता आंदोलन में जातिवादियों के वारों से अपना भी बचाव करते हुए)।

अंबेडकर ने लगातार नारी के प्रश्न को अपने राजनैतिक कार्य के मध्य में रखने की लड़ाई लड़ी। 1928 में बॉम्बे विधान सभा में औरतों के लिए वैतनिक मातृत्व अवकाश (मटर्निटी लीव) प्रदान करने वाले एक बिल का उन्होंने भरपूर समर्थन किया। 1938 में उनके सहकर्मी पी जे रोहम ने अंबेडकर की तरफ़ से बॉम्बे प्रोविंशियल असेंबली में गर्भ निरोध के समर्थन में एक बिल पेश किया जो दुर्भाग्य की बात है पास नहीं हुआ। अंबेडकर का ऐसा विश्वास था कि प्रजनन को अधिकार सिर्फ महिलाओं का होना चाहिए। 1930 और 1940 के दशकों में उन्होंने नारी मुक्ति से सम्बंधित कई बिलों के लिए संघर्ष किया जो अंततः रूढ़िवादी राजनेताओं द्वारा कमज़ोर बना दिए जाते थे। पर शायद उनकी सबसे बड़ी और सबसे दुःखद विरासत है हिन्दू कोड बिल जिसका मसविदा उन्होंने तैयार किया और 1951 में संसद में पेश किया था। हिन्दू महिलाओं को विवाह, तलाक, बच्चे गोद लेने और जायदाद में बराबरी का अधिकार दिलाकर उन्होंने हिन्दुओं में नारी उत्पीड़न के सभी ढाँचों को तोड़ गिराने की कोशिश की। हुआ यह कि संसद के भीतर और बाहर इस बिल का प्रतिगामी (रिग्रेसिव) दलों ने विरोध किया जिसके चलते अंत में अंबेडकर ने भारत के कानून मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया। (कई सालों बाद इस बिल का एक काफ़ी कमजोर संस्करण पास किया गया।)

अंबेडकर की जाति की संकल्पना, जिसके वे अब तक प्रधान आधुनिक विचारक माने जाते हैं, इस जाति व्यवस्था में अधीन महिलाओं की पीड़ा की समझ पर आधारित थी। उनका विचार था कि जाति पर आधारित लिंग-सम्बन्धी कर्मकाण्ड ही हिन्दू ब्राह्मणवादी व्यवस्था को कायम रखते हैं। सुनियोजित आचार संहिता महिलाओं के हक़ में नहीं थी क्योंकि उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान या उपलब्धि के अयोग्य मान लिया गया था। 12 दिसंबर 1938 को अनुसूचित जाति के छात्रों के एक सम्मलेन को सम्बोधित करते हुए उन्होंने शिक्षा, रोज़गार, और बेहद जरूरी, वैवाहिक संबंधों में लैंगिक समानता के महत्त्व पर ज़ोर दिया था। उन्होंने कहा, “मैंने कई सुन्दर लड़कियों को कुरूप पुरुषों के हाथों सुपुर्द किए जाते देखा है।”

“मैं इस देश से थक गया हूँ . . . इसके धर्म, सामाजिक व्यवस्था, सुधारों और संस्कृति, इन सबसे मैं थक गया हूँ। मेरा युद्ध एक सभ्यता से है।” एक दशक पहले, 1927 में उन्होंने मनुस्मृति, जो एक पुरातन हिन्दू ग्रन्थ है जिसमें सबसे निम्न स्तर का स्त्री-द्वेष नियमबद्ध मिलता है, के एक सार्वजनिक दहन का आयोजन किया था। (अध्याय 3 के खण्ड 8 में परिहार्य स्त्रियों के प्रकार की एक सूची है: जिनके शरीर पर नहीं के बराबर या तो काफ़ी ज़्यादा बाल हों, जो बहुत बोलती हों, या बस जिसके बाल लाल हों।) फिर भी इन महान पुरुषों की सूची हमें उन दलित महिलाओं को नज़रअंदाज़ नहीं करनी चाहिए जिन्होंने जाति के ख़िलाफ़ संघर्ष किया है। विदुषी मीनाक्षी मेनन और उर्मिला पवार ने अपने एक उत्कृष्ट लेख ‘हमने भी इतिहास लिखा’ (1989) में अंबेडकरी आंदोलन के पहले और बाद दोनों ही समय के दलित महिलाओं की नारीवादी उपलब्धियों का अभिलेखीय सामग्री और एथ्नोग्राफिक विवरणों के साथ बयान करते हुए इस समृद्ध इतिहास का गहन शोध किया है।

जोरू का गुलाम

भारत में नारीवादी संघर्ष मुख्यतः जातिगत भेदभाव के ख़िलाफ़ की लड़ाई है। क्योंकि जैसा हमने देखा, ब्राह्मणवादी विवाह गंभीर रूप से औरतों को दुर्बल बनाने का काम करते हैं। और तो और तलाक़ एक पाप ही माना जाता है जो एक स्त्री के (पुरुष के नहीं) चरित्र को कलंकित कर देता है। इसलिए कई औरतें अपने मर्दों के हाथों निर्दयता और अत्याचार सहती रहती हैं, जो अपनी महाकाय सत्ता से पूरी तरह वाकिफ हैं और औरतों को काबू में रखकर उनका इस्तेमाल करना जानते हैं।

क्या प्रेम इन सबके बीच कोई रास्ता दिखा सकता है? सच्चाई यह है कि भारत में “इंटर-कास्ट” या लव मैरेज अब भी एक आकर्षण और साथ-साथ बदनामी से जुड़ा है। प्रेम के चलते विवाह में जुड़े दम्पति एक जिज्ञासा का विषय बन जाते हैं। उन्होंने ऐसा किया कैसे? क्यों? कैसा होता है यह? जैसा मैंने पहले बताया, सिनेमा में प्रेम संबंधों को जाति से परे रखा जाता है, और इसलिए यहाँ निर्देश के लिए केवल कुछ ही उदाहरण हैं।

यह सच है कि लव मैरेज सिर्फ भावनाओं पर आधारित होते हैं, किसी तरह की वसीयत या पवित्र DNA को हासिल करने की कोई मंशा नहीं होती। फिर भी हमें इनसे बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं रखनी चाहिए और यह नहीं सोचना चाहिए कि रातोंरात भारत में स्थिति बदल सकती है। आख़िर हिंदुत्व का ज़हर भारतीय समाज के ख़ूब भीतर तक फैला है। अगर ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के ढाँचों को गिरा भी दिया जाए (जैसा धीरे-धीरे हो रहा है), प्रेम से जुड़ी हिन्दू मानसिकताओं को बदलने के लिए और ज़्यादा संघर्ष की ज़रूरत है। आज की हिन्दू-कृत सोच में दांपत्य प्रेम को बेधड़क और अविश्वसनीय माना जाता है। शक़ और किसी की इच्छाओं का बग़ावती जोश मानसिक और शारीरिक हिंसा को जन्म देता है।

भारतीय गृहस्थी में ‘जोरू का गुलाम’, ये शब्द काफ़ी आम भाषा का हिस्सा हैं। ये अक्सर उन पुरुषों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किए जाते हैं जो अपनी पत्नियों के प्रति समर्पित हैं। उन पुरुषों का मज़ाक उड़ाया जाता है जो अपनी पत्नियों के प्रति आभार का सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शन करते हैं। अपनी पत्नी के प्रति प्रेम एक कमज़ोरी या दब्बूपन की निशानी माना जाता है। यह पितृसत्ता की विरासत है कि समाज के रूखेपन का सामना करते ही एक लड़का एक उग्र, उद्दंड पुरुष में बदल जाता है, उस चरित्र में जिसे समाज ने उसके भीतर एक आदर्श के रूप में बिठा रखा है।

लेकिन यह भी है कि रिश्तों और विवाह को कोई इतना बढ़ा-चढ़ा कर भी नहीं देखना चाहता। आखिर परंपरागत समाज में शादी करने का दबाव—चाहे अपनी मर्ज़ी से या औरों की—काफ़ी ज़्यादा होता है और इसका युवक-युवतियों पर ख़ासा असर पड़ता है। समाज के दबाव के साथ-साथ रिश्तेदारों का बार-बार सताना माँ-बाप को अपने बच्चों को विवाह के परंपरागत रास्ते पर चलने के लिए फुसलाने को मजबूर कर देता है। विवाह के व्यक्तिगत भाव से ज़्यादा शादी एक तरह से बस अभिभावकों की शादी होकर रह जाती है। शादी के रिवाज़-रस्मों में आसानी से देख सकते हैं कि माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य को लेकर ख़ुश भी हैं और चिंतित भी। यह याद रखने की जरूरत है कि भारत में शादी करने की औसत उम्र लगभग बाईस साल है, जबकि कई विकसित देशों में यह क़रीब तीस साल है। इतनी जल्दी एक पारिवारिक संस्कृति में शुरुआत करना यहाँ का कायदा है, और यह आम धारणा है कि तुम संसार में बच्चे पैदा करने के लिए ही आए हो। और एक लड़के (नर बच्चे) को जन्म देना सचमुच में “सफलता की पराकाष्ठा” है। भारत जैसे कुपीड़ित समाज में एक अविवाहित व्यक्ति एक रोग की तरह देखा जाता है। बड़े-बुज़ुर्ग हेट्रोसेक्सुअल (और किसी विरले मामले में होमोसेक्सुअल) साथी के साथ ही जीवन की मानों प्राकृतिक अवस्था मानते हैं। शायद ही कभी किसी अविवाहित के जीवन को आदर्श उदाहरण के रूप में देखा जाता है।

उन पुरुषों का मज़ाक उड़ाया जाता है जो अपनी पत्नियों के प्रति आभार का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं। अपनी पत्नी के प्रति प्रेम एक कमज़ोरी या दब्बूपन की निशानी माना जाता है।

किसी उम्र तक पहुँच चुके एक अविवाहित व्यक्ति को आर्थिक रूप से शक़ की निगाह से देखा जाता है। रिवाज़-रस्मों की रैट-रेस में भागने की बजाय भला कोई क्यों अपने पसंद की ज़िन्दगी जीना चाहेगा?

पूँजीवाद ने इन समस्याओं को और भी जटिल बना दिया है। प्रजनन की धारणा ऋण के व्यवसाय में बिलकुल ठीक बैठती है जिसने एक नई जीवनशैली का ईजाद किया है और जिस पर उसका पूरा नियंत्रण है। अपनी इच्छाओं और सपनों को बैंकों की नियमावली के दायरों में बाँधकर बचत के मॉडल के साथ अपना तालमेल बिठाना पड़ता है। कई बार हम ऋण के दस्तावेज़ के पंजों के माध्यम से ही सपने देखते हैं। शोषक कॉर्पोरेट व्यवसाय यह तय करता है कि हम सपनों में क्या देखें और कितने सपने देखें। कई बार (वैवाहिक) साझेदारी बाजार के नियमों के इर्द-गिर्द मिलती है। अपने बटुए की हैसियत से कोई अंदर जाता है तो कोई बाहर निकल जाता है। जॉब सिक्योरिटी (रोजगार की निश्चितता) की अनिश्चितता और ऋण का भार अकेले चलने की सलाह नहीं देता। इसलिए जरूरी हो जाता है एक साथी ढूँढना—ताकि आप अपना अकेलापन और अपनी तकलीफ़ काम कर सकें।

कभी प्यार कभी ख़ुशी

भारत में स्थिति चाहे जितनी भी ख़राब क्यों न हो, वहाँ की युवा शक्ति बाग़ी है और आमूल परिवर्तन की माँग करती है। युवक-युवतियाँ—कम से कम उनमें से कुछ—अब तक हिन्दू समाज के पूर्वाग्रहों से प्रभावित नहीं हुए हैं और देखें तो संभवतः स्वच्छंद-मौलिक शक्ति का एक स्रोत हैं।

युवा भारतीयों को स्वच्छंद प्रेम को अपनाना चाहिए, यह जानते हुए कि प्रेम एक गहरा अनुभव है और किसी सुख की दुनिया का एकतरफ़ा टिकट नहीं है। वैवाहिक संबंधों के सन्दर्भ में देखें तो हमें एक मैरेज मैनिफेस्टो (घोषणापत्र)—शादी के बाद की सुविधाओं का ब्यौरा—चाहिए। पुरुषों और महिलाओं को अपनी सारी गहरी चिंताओं पर स्वतन्त्र रूप से चर्चा करनी चाहिए। समलैंगिक वैवाहिक संबंधों के लिए नए संस्करण ढूँढे जा सकते हैं। हेट्रोसेक्सुअल घोषणापत्र में महिलाओं को अपनी ज़रूरतों, इच्छाओं और अपनी यौन पसंद, बदलती मनोदशाओं और भूमिकाओं से निपटने के तरीकों, इन सब का ब्यौरा तैयार करना चाहिए। इसके बाद पुरुषों को भी ऐसा करना चाहिए। यह जरूरी है कि प्रेम कोई हवाई ख़्वाब नहीं बनकर रह जाए बल्कि अपनी पहुँच के भीतर लाया जाए।

पंद्रहवीं सदी के एक रहस्यवादी कवि, कबीर भारत के सबसे बड़े जाति-विरोधी विचारकों में से एक हैं। लेखक ओशो अपनी क़िताब ‘कबीर के दोहों पर’ में ग़ौर फ़रमाते हैं, “अगर सच में तुम किसी स्त्री से प्रेम करना चाहते हो, तो उससे कभी विवाह मत करो। अगर तुम सचमुच किसी पुरुष से प्रेम करती हो, तो उससे जितना दूर हो सके भाग लो। तब तुम हमेशा प्रेम करोगे। पर अगर तुम पूरे प्रेम-सम्बन्ध का सत्यानाश करना चाहते हो, तो शादी कर लो।” कहीं और अपने हलके फक्कड़ अंदाज़ में कहते हैं, “प्रेम का घर तो बहुत ऊँचा और तनहा है।” इसलिए, “प्रेम को बनाए रखना मुश्किल है, सबके बूते की बात नहीं है।” इसलिए विवाह उसका एक अधपका नतीज़ा है।

Suraj Yengde is the author of Caste Matters and a senior fellow at the Harvard Kennedy School.

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